How To Perform Vashikaran Sadhana

How To Perform Vashikaran Sadhana

How To Perform Vashikaran Sadhana

तंत्र-मंत्र के संसार में वशीकरण अति महत्वपूर्ण और बहुप्रचलित माना जाता हैं। वशीकरण का तात्पर्य है-किसी व्यक्ति विशेष अथवा समूह को अपने अधीन (वश में) करना। तंत्र विज्ञान में वशीभूत करने के अनेक नाम और साधनाएं हैं; यथा-सम्मोहन सिद्धि, आकर्षण सिद्धि, मोहन सिद्धि, मोहिनी विद्या और वशीकरण सिद्धि। ये सब एक सिक्के के ही मानो अलग- अलग पहलू हैं।

कुछ समय पूर्व तक बुद्धिजीवी वर्ग तंत्र-मंत्र-यंत्र का महत्व स्वीकार नहीं करता था परंतु आज इनके महत्व और शक्ति को सभी वर्ग के लोगों ने खुले मन से स्वीकार कर लिया हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि इस संसार में अलौकिक शक्तियां विराजमान हैं। आम धारणा है कि तांत्रिक केवल तामसिक प्रवृत्ति के ही होते हैं तथा उपद्रवी स्थितियां उत्पन्न करते हैं परंतु ऐसा नहीं हैं। यह सब तांत्रिक की प्रकृति पर निर्भर करता हैं। अपने जीवन काल में व्यक्ति का जैसा स्वभाव होता है, साधना के उपरांत उसका स्वभाव वैसा ही बना रहता है।

वेदों में जिन साधनाओं तथा विधि-विधानों का उल्लेख है, उनकी प्रक्रिया बहुत लंबी हैं। उन्हीं में से एक तंत्र विद्या भी हैं। सांसारिक लोग अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए तंत्र विद्या को सहज मार्ग समझते हैं। आज सभी प्रदेशों में तंत्र साधना का अपना अलग महत्व हैं। भारतवर्ष में तंत्र शब्द का व्यापक रूप से प्रयोग हुआ हैं। तंत्र का अर्थ अनुष्ठान और रक्षा आदि से लिया जाता हैं। तंत्र द्वारा ही सांसारिक और पारलौकिक जीवन में सुख प्राप्त होता है।

तंत्र उस प्रक्रिया को भी कहते हैं जो मंत्रानुष्ठान के सिद्धांतों पर निर्भर हैं। तंत्र मनुष्यों को अनेक डरों से छुटकारा दिलाता है अर्थात जो उनकी रक्षा करने में समर्थ है, वही तंत्र हैं। तंत्र ग्रंथों का उदय भगवान शिव और पार्वती के परस्पर संवाद के द्वारा हुआ था। जब पार्वती ने मानव कल्याण के लिए शिवजी से कुछ प्रश्न पूछे और शिवजी ने उनके उत्तर दिए तो वही उत्तर तंत्रों के रूप में प्रकट हुए। शिव-पार्वती संवाद से जो विद्या प्रकट हुई, उसी ने कालांतर में तंत्र शास्त्र का रूप लिया। विभिन्न प्रदेशों की भौगोलिक स्थितियों के आधार पर तंत्र विद्या का प्रचार और विकास हुआ। तंत्र विद्या तीन प्रकार की होती है -सात्विक, राजस और तामस। दत्तात्रेय और गौतमीय तंत्र सात्विक तंत्र हैं। शैवगामी आदि तंत्र राजस और भैरव तंत्र तामस तंत्र हैं। तंत्र शास्त्र में साधना की तीन विधियां हैं-तंत्र, मंत्र और यंत्र। तंत्र प्रधान होता हैं। इसके द्वारा तांत्रिक विशेष प्रकार की सूक्ष्म तरंगें उत्पन्न करता है जो मनुष्य की इच्छाओं को पूर्ण करने में सहायक होती हैं। मंत्र का उच्चारण विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता हैं। ये मंत्र शक्ति केन्द्र को प्रभावित करके अभीष्ट फल प्रदान करने में सहायक होते हैं।

यंत्र आकृति प्रधान होता हैं। जिस प्रकार मनुष्य सामान्य आकृतियों को देखकर किसी न किसी प्रकार से प्रभावित होता है, उसी प्रकार तांत्रिक यंत्र से देवी-देवता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। तंत्र साधना हेतु पहाड़ों, नदियों के संगम, गुफाओं, घाटियों और जंगलों को सिद्धिदायक स्थल माना जाता है क्योंकि वहां तंत्र के लिए सरलतापूर्वक सामग्री उपलब्ध हो जाती हैं। ऐसे स्थान प्राचीन समय से ही देवी-देवताओं के साधना स्थल रहे हैं। जब किसी निश्चित तिथि, दिन, वार एवं नक्षत्र आदि में राशि के अनुसार विधि-विधानपूर्वक साधना की जाती है तो चमत्कारिक परिणाम सामने आते हैं।

तंत्र विधि द्वारा साधक ध्यानमग्न होकर संपूर्ण शरीर को स्थिर करके अतुल गहराई तक पहुंचकर परम सुख प्राप्त करता है लेकिन लोकप्रियता हठयोग को मिली हैं। हठयोग का अर्थ है-बलपूर्वक योग। इसमें रेचक, पूरक, नेती, धौति और कुंभक के द्वारा मन पर अधिकार किया जाता हैं। हठयोग ने दुनिया में कई चमत्कारिक क्रियाओं को जन्म दिया हैं। शैव एवं शाक्त मत के योगी हठयोग द्वारा अपने अभीष्ट को पा लेने की क्षमता रखते थे। राजयोग का दायरा सीमित था क्योंकि सनातन धर्म में विश्वास करने वाले योगमार्गी ही इसके पीछे अपनी साधना को परवान चढ़ाते थे। समाधि में जाने के लिए तंत्र साधना का सहारा लेना ही पड़ता था।

आज तंत्र को चमत्कार का पर्याय माना जाता हैं। जब भी कोई चमत्कार होता है, उसे तंत्र का चमत्कार कह दिया जाता हैं। हमारे देश में कभी स्टोव से देवता प्रकट हो जाता है, कभी मूर्ति दूध पीना प्रारंभ कर देती है तथा कभी किसी अबोध लड़की में कोई देवी प्रकट हो जाती हैं। ऐसे में उसके चारों ओर दर्शनार्थियों की भीड़ एकत्रित होने लगती हैं। कभी एक स्थान पर कोई चमत्कार हो जाता है तो कभी दूसरे स्थान पर। आज सामान्यजन इतना घबराया हुआ है कि प्रातःकाल जब समाचारपत्र उसके हाथ में आता है तो सबसे पहले वह अपना राशिफल पढ़ता है और दिनभर अच्छे या बुरे होने की संभावना का बोझ उठाए फिरता हैं। आस्था और अंधविश्वास में भेद करने वाली लकीर बहुत पतली होती हैं। क्षणभर में आस्था अपनी सीमाओं को लांघकर अंधविश्वास के संसार में प्रवेश कर जाती हैं।

व्यक्ति का जीवन इच्छाओं और मनोकामनाओं से परिपूर्ण रहता हैं। प्रत्येक व्यक्ति यह चाहता है कि उसकी सभी इच्छाओं की पूर्ति सरलतापूर्वक हो जाए। लेकिन जीवन में निरंतर आने वाली बाधाओं के कारण उसे हर क्षण संघर्ष करना पड़ता हैं। इन बाधाओं को दूर करने हेतु किसी विशेष तंत्र-मंत्र की आवश्यकता नहीं हैं। बस, कुछ सरल साधनाओं द्वारा आप पूर्ण सफलता प्राप्त करके जीवन का सच्चा सुख और आनंद प्राप्त कर सकते हैं।
आज के अति आधुनिक वैज्ञानिक युग में अंधविश्वासों और कार्यकलापों के पीछे विज्ञान सम्मत कोई ठोस तर्क नहीं है फिर भी मनुष्य इन्हें नहीं छोड़ पाता। जो संस्कार अथवा मान्यताएं मस्तिष्क में जड़ पकड़ लेती हैं, वे लाख प्रयत्न करने पर भी सरलतापूर्वक नहीं छूटतीं। आज विज्ञान कितनी ही प्रगति कर ले परंतु वह मानव-मन की गुत्थियों को नहीं सुलझा पाया हैं। कई चमत्कारिक घटनाएं आज भी विज्ञान को चुनौती देती हैं। इसीलिए लोगों का तंत्र-मंत्र, ज्योतिष एवं परामनोविज्ञान के प्रति दिनों-दिन विश्वास बढ़ता जा रहा हैं।

इसी तंत्र, मंत्र एवं यंत्र द्वारा वशीकरण का प्रभाव उत्पन्न किया जा सकता हैं। इसके अलावा वशीकरण ही अकेला नहीं हैं। इसमें सम्मोहन, मोहिनी विद्या और आकर्षण भी आ जाते हैं। मंत्र और तंत्र द्वारा वशीकरण सुगम है लेकिन यंत्र द्वारा वशीकरण दुर्गम हैं। मंत्र का अर्थ है जो हमारे हृदय को प्रभावित करे या जिससे हमारा हृदय सम्मोहित हो जाए। मंत्र का सीधा संबंध वर्ण से है और वर्ण का हमारे मन से गहरा संबंध हैं। हर शब्द का अपना अलग कंपन और महत्व होता है तभी तो इन शब्दों से मिलकर बनने वाले गीतों की ओर हम आकृष्ट होते हैं। क्या कभी आपने इस बात पर विचार किया कि हमें कोई गीत सबसे अच्छा क्यों लगता है? यह शब्दों और उनके संयोजन का मायाजाल हैं। ये शब्द कभी हमें एकांत और कभी मौन के क्षेत्र में ले जाते हैं तो कभी नई ऊर्जा एवं नई सोच से भर देते हैं। इन सबके पीछे एक ही तथ्य है-शब्दों में छिपी तंत्र-मंत्र की शक्ति।

यह सर्वथा सत्य है कि मंत्रों में शक्ति होती हैं। हर मंत्र के शब्दों को इस प्रकार संजोया जाता है कि उनके उच्चारण से जो ध्वनि उत्पन्न होती है, उसमें थोड़ा-बहुत अंतर पड़ता हैं। परंतु किसी भी मंत्र का मात्र एक बार जप करने से प्रभाव नहीं पड़ता, उसे नियमित दोहराना पड़ता हैं। मंत्र की सत्ता दोहराने में हैं। बार-बार दोहराने में ही मंत्र की शक्ति छिपी होती हैं। यह इस प्रकार होना चाहिए कि मंत्र जैसे ही संपूर्ण हो, दूसरी बार की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी जाए।

दूसरे शब्दों में मंत्र वह है जो हमें और हमारे शरीर को जागृति के पथ पर अग्रसर कर सके। अब प्रश्न यह है कि किस मंत्र का जप करें? यूं तो हमारे तंत्र ग्रंथों में हजारों मंत्र हैं जिनकी रचना उद्देश्यों और आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर की गई हैं। परंतु मंत्रों का चयन कुशल दैवज्ञ के मार्ग निर्देशन में ही करना चाहिए। तंत्र शास्त्र के अनुसार मंत्र साधारण शब्दों के समान नहीं है बल्कि वह चैतन्य रूप हैं। उसमें प्रभु की असीम शक्ति व्याप्त हैं। जब तक साधक उसे सच्चे हृदय से नहीं लेगा और उसमें चैतन्य सत्ता अनुभव नहीं करेगा तब तक वह उसमें न तो तन्मय हो सकेगा और न ही सिद्धि प्राप्त कर पाएगा। योगदर्शन में सच्ची भावना से किए गए जप को ही ठीक माना गया है अन्यथा जप व्यर्थ हैं।

वशीकरण साधना में धैर्य रखने तथा विश्वास न छोड़ने की आवश्यकता हैं। साधक अपनी मान्यताओं के वश होकर जो कुछ पड़ता या सुनता है, वह उसको अनुभव में लाने का प्रयत्न करता है और वैसा अनुभव न होने पर साधना के प्रति विश्वासहीन हो जाता हैं। फिर अनेक प्रकार की साधनाओं की खोज में मन दौड़ता है और वह एक साधना के पश्चात दूसरी साधना करता हैं। इस प्रकार किसी भी साधना में स्थिरता न होने के कारण उसे असफलता प्राप्त होती हैं।

वशीकरण साधना केवल गुणप्रद नहीं होती। इस विश्व की रचना द्वंद्वात्मक है; अतएव गुण के साथ अवगुण, सुविधा के साथ असुविधा तथा अनुकूलता के साथ प्रतिकूलता रहती हैं। यदि साधक अवगुण, असुविधा और प्रतिकूलता पर ध्यान न देकर श्रद्धापूर्वक एक ही साधना में लगा रहे तो सफलता प्राप्त हो सकती हैं। तंत्र-मंत्र की क्रियाएं परस्पर अलग हैं परंतु वे एक-दूसरे की पूरक हैं। तंत्र साधना में वस्तु प्रधान होता है जबकि मंत्र साधना शब्द प्रधान होती हैं। तंत्र साधना में कई निश्चित क्रियाएं संपादित होती हैं; जैसे-हवन, यज्ञ, आहुति एवं पुतला गाड़ना आदि। लेकिन मंत्र साधना में शब्दों का प्रयोग करके ऊर्जा उत्पन्न की जाती हैं। तंत्र-मंत्र से प्राप्त ऊर्जा को ही यंत्र में स्थापित किया जाता हैं।

मंत्र और तंत्र भारतवर्ष की प्राचीन विद्याएं हैं। तंत्र विद्या का संबंध पदार्थ विज्ञान, रसायन शास्त्र, आयुर्वेद तथा ज्योतिष से हैं। तंत्र-मंत्र की प्रयोगशाला मनुष्य का शरीर हैं। शरीर में विद्यमान शक्ति केन्द्रों को जाग्रत करके सिद्धि- सफलता प्राप्त करना इसका प्रमुख उद्देश्य हैं। तंत्र की शक्ति का मूल उद्‌गम है- इंद्रजाल। सृष्टि में इंद्रजाल की समस्त क्रियाओं का ज्ञान मात्र भगवान शिव को ही था। उन्होंने यह चमत्कारी ज्ञान रावण को दिया था। भगवान शिव से इंद्रजाल का ज्ञान प्राप्त करके रावण हिमालय पर जाकर तंत्र साधना में जुट गया। उसने इन साधनाओं से इतनी शक्ति अर्जित कर ली कि अखिल ब्रह्मांड में रावण का यशगान होने लगा तथा सौरमंडल रावण के कथनानुसार चलने लगे।

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