Importance Of Mantra In Our Life

Importance Of Mantra In Our Life

Importance Of Mantra In Our Life

शब्दो की शक्ति अनंत और असीम है। दूसरों को मित्र या शत्रु बनाने का काम जितना वाणी करती है, उतना कोई दूसरा नहीं कर सकता। मंत्र साधना एक प्रभावशाली प्रक्रिया है जिसके आधार पर चमत्कारिक शक्ति उत्पन्न की जा सकती है। यही शक्ति भौतिक एवं आत्मिक क्षेत्रों को आश्चर्यजनक सफलताओं से भर सकती है। मंत्र शक्ति में चमत्कारों का प्रधान आधार ‘शब्द’ है। यह शब्द क्या है? अगर शब्दों की ध्वनि को क्रमबद्ध करके गूंजने दिया जाए तो प्रलयंकारी अथवा सुरक्षात्मक-दोनों प्रकार से कार्य कर सकती है।

नेपोलियन बोनापार्ट की सेना की एक टुकड़ी एक पुल के ऊपर से जा रही थी। इतने में पुल हिला और गिर गया। सेना नदी में बह गई। कारण खोजने पर यह पता चला कि पदचाप के प्रभाव से ऐसा हुआ। बादशाह अकबर के समय में संगीत सम्राट तानसेन द्वारा संगीत से वर्षा करवाना, हाथी को वश में करना, दीपक जलाना, जंगल में विचरते हिरणों को बुलाना आदि सभी ध्वनि चमत्कार ही थे। संगीत केवल मनोरंजन ही नहीं है बल्कि इसके द्वारा पशुओं से अधिक दूध लेना, वनस्पतियों का अधिक फलना-फूलना तथा मनोरोगियों की चिकित्सा करना भी संभव है। यह संगीत भी मंत्र अर्थात शब्दों का ही रूप है। मंत्र से भावनाएं जुड़ी रहती हैं और एक ही विचारधारा को लगातार मस्तिष्क में स्थान देने से वह अवचेतन मन में जाकर एक निरंतर प्रवाह का रूप धारण कर लेता है।

मंत्र साधना में सफलता के लिए साधक उपयुक्त व्यक्तित्व के निर्माण हेतु जितना अधिक ध्यान दे, उतना ही उत्तम है। शरीर के क्रियाकलाप ऐसे हों जिनसे इंद्रिय शक्ति विकृत न होने पाए। इस दृष्टि से इंद्रिय निग्रह, संयम और सदाचार पर अत्यधिक बल दिया जाना चाहिए। साथ ही भावनाओं की एकाग्रता मंत्र शक्ति में प्राण फूंकती है। साधना के लक्ष्य एवं साधना की सफलता के विषय में मन संशय रहित रहना चाहिए। इसके लिए सतत प्रयत्न तथा धैर्य भी अनिवार्य है।

श्रद्धा और एकाग्रता युक्त मन, स्वच्छ वस्त्र, एकांत स्थान तथा उपकरणों का ध्यान रखते हुए किया गया जप तुरंत फलदायी होता है। ऐसा करने पर अनजानी शक्ति मिलती है जो साधक में अधिक आत्मबल का संचार करती है। हर्ष, संतोष और प्रकाश के रूप में मंत्र की शक्ति को परखा जा सकता है। किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति को इस उपलब्धि से प्रभावित किया जा सकता है। एक बार स्वामी रामतीर्थ ने कहा थाथा ईश्वरो देखा या दिखाया नहीं जा सकता। गर्मी, सर्दी या दुख की मात्र अनुभूति होती है, उन्हें प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता। मंत्र में उच्चारित शब्दावली मंत्र की मूल शक्ति नहीं है वरन उसको सजग करने का साधन मात्र है। हमारे ऋषियों ने मंत्र को अपने- अपने ढंग से परिभाषित किया है। उनका कहना है कि जिसके मनन, चिंतन और ध्यान से पूरी सुरक्षा मिले तथा दुख-कष्ट से निवृत्ति होकर दिव्य आनंद की प्राप्ति हो; वही मंत्र है। मंत्र सामान्यत: दो प्रकार के होते हैं-पहला, वैदिक मंत्र और दूसरा, तांत्रिक मंत्र। वेदों की संहिताएं वैदिक मंत्र हैं। मंत्र असंख्य हैं। पुराणों, वेदों तथा उपनिषदों में इनका वास है। ‘ अग्नि पुराण ‘ में वर्णित है कि मंत्र जप द्वारा जन्म, मरण और पापों का नाश होता है क्योंकि यह इष्टदेव का अनुग्रह है। प्रत्येक मंत्र में तीन आवश्यक तत्व-प्रणव, बीज तथा देवता निहित रहते हैं। प्रणव परम तत्व के निकट ले जाता है, बीज परम तत्व का दर्शन कराता है तथा देवता परम तत्व की लीला भाव दर्शाता है। देवोपासना की यज्ञ- अग्नि में साधक को अपने तन, मन, बुद्धि और अहंकार की पूर्णाहुति देनी पड़ती है। ॐ क्लीं कृष्णाय, नमः शिवाय या नमो नानारायणाय – ये नाम मंत्र हैं। नाम मंत्रों-में देवता, उसकी शक्ति और रूप के दर्शन होते हैं। कुछ आचार्य बीस अक्षरों से अधिक तथा कुछ आचार्य बत्तीस अक्षरों वाली माला को मंत्र कहते हैं।

ऋषि मंत्रों के कर्ता नहीं अपितु द्रष्टा हैं। मंत्र का प्रयोग अथवा उच्चारण करने वाला मंत्र का द्रष्टा होता है। वेदों से व्याकरण का प्रादुर्भाव हुआ और व्याकरण से शब्दों की उत्पत्ति हुई। व्यंजन एवं स्वर से शब्द निर्मित होते हैं। बिना स्वर के कोई भी शब्द नहीं बन सकता। शब्दों के आधार पर ही नाम मंत्रों की उत्पत्ति हुई। मंत्रों में शब्दों की संख्या का बहुत महत्व है। ऋषियों ने प्रत्येक देवता के मंत्रों की रचना में शब्दों की संख्या का विशेष ध्यान रखा है और उसे मंत्र का रूप दिया है। इसके साथ ही मंत्रों के शब्दों की संख्या घटाकर सूक्ष्म मंत्रों की भी रचना की है जिसे हम  ‘ बीज मंत्र ‘ कहते हैं। पूर्ण मंत्रों और बीज मंत्रों की शक्तियां बराबर हैं लेकिन जप करने की संख्याओं में अंतर रखा गया है।

शब्द की नैसर्गिक एवं आध्यात्मिक शक्ति को अभिव्यक्त करने वाला संकेताक्षर बीज कहलाता है। इसकी शक्ति और रूप अनंत हैं। यह भिन्न-भिन्न देवताओं के साथ धर्म एवं संप्रदायों की विविध साधनाओं में साधकों को विभिन्न प्रकार के रहस्यों से परिचित कराता है। शैव, शाक्त, वैष्णव और बौद्ध संप्रदायों के मंत्रों में ऐं, हीं, क्लीं आदि बीजों का प्रयुक्त होना इसका साक्ष्य है। बीज मंत्र तीन प्रकार के होते हैं-पहला मौलिक, दूसरा यौगिक और तीसरा कूट। इन्हें एकाक्षर, बीजाक्षर और घनाक्षर के नाम से भी जाना जाता है। जब बीज दो वर्णो के योग से बनता है तो उसे यौगिक बीज कहते हैं; जैसे-क्लीं, हीं आदि। जब बीज तीन या उससे अधिक वर्णो से बनते हैं तो वे कूट बीज कहलाते हैं।

देवताओं और नवग्रहों के मंत्र सिद्ध करने के लिए अलग- अलग संख्या निर्धारित है। सर्व विघ्न दूर करने और मनोकामनाएं पूरी करने के लिए गणपति मंत्र का सवा लाख जप निर्धारित है। सर्व कष्ट दूर करने के लिए महामृत्युंजय ‘ बीज मंत्र ‘ का 11 लाख जप निर्धारित है। इसी प्रकार नवग्रहों-सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु के मंत्रों की जप संख्या क्रमश: 24 हजार, 4० हजार,  28 हजार, 68 हजार, 48 हजार, 8० हजार, 76 हजार, 72 हजार तथा 28 हजार है। मंत्रों के हजारों-लाखों जप करने का परामर्श इसलिए दिया जाता है ताकि मंत्रों के शब्दों में तीव्र शक्ति उत्पन्न होकर साधक को इसका लाभ मिल सके।

प्राचीन काल में वेदों की ऋचाएं गाई जाती थीं। ऋचाएं सुनकर स्मरण रखने की एक परंपरा थी जिसे ‘ मंत्र ‘ कहा जाता था। ऋचाएं गाने से उन मंत्रों में शक्ति का संचार होता था। इसीलिए प्रत्येक नाम को बार-बार उच्चारित किया जाता है जो  ‘ बीज मंत्र ‘ का रूप धारण कर लेता है और उससे उस नाम वाला देवता विशेषत: आकर्षित होता है। यही वशीकरण एवं आकर्षण कहलाता है।

बीज, माला एवं नाम मंत्रों में अंतर होता है। प्राचीन ऋषियों ने कठिन साधना द्वारा प्राप्त देवताओं के मंत्रों से उनके सूक्ष्म ‘ बीज ‘ को पृथक किया है। जिस प्रकार एक सूक्ष्म बीज में वृक्ष का आकार छिपा है, उसी प्रकार किसी देवता के बीज मंत्र में उसका रूप, आकार, तेज, गुण, शक्ति और दिव्य सिद्धियां निहित रहती हैं। नौ अक्षर तक यह मंत्र बीज मंत्र कहे जाते हैं। मंत्र में निष्ठा, विश्वास तथा विधिपूर्वक जप से साधक को सिद्धि की प्राप्ति होती है। मंत्रों का प्रयोग करने से पहले संकल्प लिया जाता है। इस संकल्प में देवताओं को साक्षी मानकर वर्ष, मास, पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्र, अपना गोत्र तथा नाम आदि का स्मरण करते हुए मैं यह कार्य करूंगा, कहा जाता है। संकल्प इस प्रकार है- ३० विष्णु: विष्णु; विष्णु मासोत्तमे मासे-कृष्णपक्षे प्रणायाम अमावस्या अमुक तिथौ अमुक वासरे अमुक गोत्रोत्पन्नः अमुक नाम अहं श्रुतिस्मृति पुराणोक्त फलं प्राप्ति कामनया ज्ञाताज्ञात कायिक वाचिक मानसिक सकलपाप निवृत्ति पूर्वके स्थिर लक्ष्मीप्राप्तये श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थ महालक्ष्मी पूजनं कुबेरादीनां च पूजनं करिष्ये।

मंत्रों में ध्वनि और उच्चारण का काफी महत्व है। मंत्र में नाद अर्थात शक्ति और ध्वनि तरंगें होती हैं। मंत्र औषधि की तरह प्रभाव नहीं दिखाते। औषधि से शरीर स्वस्थ होता है जबकि मंत्र से मन एवं आत्मा पुष्ट होती है। मंत्र सभी पड़ सकते हैं। नाम मंत्र वे मंत्र हैं जो गुरु अपने शिष्य को देता है। इसका प्रयोग कर्मकांड के द्वारा ही होता है। इसके लिए विधिपूर्वक प्रशिक्षण आवश्यक है। इसमें उच्चारण पर विशेष बल दिया जाता है क्योंकि अधिकांश मंत्रों का सस्वर पाठ होता है। बीज मंत्रों के लिए मंत्र मेलापक की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार विवाह निश्चित करने से पहले गुण मेलापक किया जाता है और इसके माध्यम से उपयुक्त वर-वधू का चुनाव होता है, उसी प्रकार मंत्र दीक्षा से पूर्व साधक तथा मंत्र का मेलापक किया जाता है। इसके द्वारा कौन सा मंत्र ठीक रहेगा, इसका निर्णय लिया जाता है। मंत्र मेलापक द्वारा मंत्र की चार श्रेणियां निर्धारित की गई हैं-सिद्ध, साध्य, सुसिद्ध तथा शत्रु। इसलिए मंत्र मेलापक को सिद्धादि शोध भी कहते हैं। इसके लिए पांच चक्रों का उपयोग किया जाता है-कुलाकुल चक्र, राशि चक्र, नात्र चक्र, अकडम चक्र और अथह चक्र। बीज मंत्र देवी-देवता के लिए होते हैं इसलिए गुरु की आज्ञा के बिना इसका प्रयोग न करें। गुरु द्वारा दिए गए मंत्र को आप किसी के सामने प्रकट नहीं कर सकते।

यह सत्य है कि जब दो वस्तुएं आपस में टकराती हैं तो उसमें से ध्वनि अथवा चिंगारियां निकलती हैं। टकराने पर जो तीसरी वस्तु प्राप्त होती है, उसे शक्ति कहा जाता है। ‘ शब्द ‘ और ‘ लय ‘ का विलय होने पर तीसरी शक्ति का जन्म होता है और वह शक्ति ही आकर्षण या वशीकरण का कारण होती है।

प्रत्येक मंत्र का आरंभ अथवा अंत ओं से होता है। ओं वैदिक ध्वनि है। ॐ पूर्ण है। पूर्ण से ही पूर्ण की उत्पत्ति होती है। ॐ शांति देने वाला है तभी तो कहा गया है- ॐ शांति: शांति: शांति:। यह महासूत्र सचमुच ज्ञान का भंडार है। जब इसकी व्याख्या करें तो इस वाक्य के प्रथम शब्द की व्याख्या आवश्यक है। पूर्ण क्या है-यह समझना नितांत आवश्यक है क्योंकि यह इस सूत्र की नींव है। इसलिए सर्वप्रथम पूर्ण पर विचार करें और समझें कि पूर्ण क्या है। जब परमात्मा के संदर्भ में पूर्ण की चर्चा या विचार करते हैं तब यह सोचते हैं कि परमात्मा और पूर्ण चल है या अचल अथवा दोनों है। अगर चल है तो अचल नहीं। यदि अचल है तो चल नहीं। वस्तुत: परमात्मा सर्वान्तर्यामी, सर्वशक्तिमान और पूर्ण हैं।

ॐ का ध्वन्यात्मक नाद दैवीय शक्तियों को दिया गया वैसा ही संबोधन है जैसे हम संबोधन का उपयोग करते समय कहते हैं। मंत्र की पूर्णता के समय प्राय:  ‘ फस् ‘ फट का उच्चारण किया जाता है। मंत्र विद्या और विज्ञान के मध्य की इन समानताओं को देखकर लगता है कि भारतीय तंत्र विद्या के पास मौखिक आदेश मानने वाली कोई न कोई तकनीक अवश्य थी। शब्द- ध्वनि और लय के समन्वय से की जाने वाली मंत्र सिद्धि एक कठिन क्रियात्मक अनुष्ठान है। जब मंत्रों के जप द्वारा देवता से संपर्क स्थापित हो जाता है तो उसे ‘ मंत्र सिद्धि ‘ कहा जाता है।

वर्तमान समय में मंत्र का समय-काल बदले जाने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती। साधना करने के लिए चार समय निर्धारित हैं-प्रातःकाल सूर्योदय के समय, मध्याह्न-दोपहर के समय, सायंकाल-सूर्यास्त के पश्चात और अर्द्धरात्रि में। इन चार कालों में आप साधना कर सकते हैं। मंत्र साधना में शुद्ध उच्चारण आवश्यक है। इसके लिए ध्वनि- आघात एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। मंत्रों की ध्वनियों का बारंबार जप करके अदृश्य शक्तियों को इच्छित संकेत भेजे जा सकते हैं। तांत्रिकों की इस रहस्यमयी आस्था की ओर अब सभी का ध्यान जा रहा है।

भौतिक विज्ञान अब उन अभौतिक रहस्यों में रस ले रहा है जिन्हें वह अंधविश्वास कहकर नकारता आया है। अब सभी यह मानने लगे हैं कि तांत्रिकों के पास कोई न कोई ऐसी विद्या अवश्य रही होगी जिससे वे दूर बैठे अभीष्ट कार्य को संपादित कर लेते थे। तंत्रविदों का मानना है कि तंत्र विधियों की लीक पर चलकर कोई भी साधक सिद्धि प्राप्त कर सकता है। तांत्रिकों का यह भी कहना है कि मंत्रों के आदेश (मंत्रादेश) से अदृश्य शक्तियों से संपर्क साधा जा सकता है। इसका अर्थ है कि मंत्र ऐसी ध्वनि संकेतों पर आधारित दूरसंचार प्रणाली है जो दृश्य और अदृश्य शक्तियों के मध्य सीधा संबंध स्थापित करती है।

मंत्र विद्या में भी ध्वनि-तरंगों को विद्युत कंपनों में बदला जाता है। इन विद्युत कंपनों को मंत्र शास्त्र में ‘ अग्नि बीज ‘ कहा गया है। ये अग्नि बीज मस्तिष्क की उच्च क्षमता से सुदूर अदृश्य लोक में प्रतिष्ठित देवता तक मंत्र निवेदन पहुंचा देते हैं। आज विज्ञान के द्वारा विकसित विद्युत आम व्यक्ति की आवश्यकता बन गई है। किंतु इसने परावलंबन की ओर भी धकेला है जबकि तंत्र स्वावलंबन का पाठ पढ़ाता है। परावलंबन सुख का नहीं, दुख का जनक है।

मंत्रों की सिद्धि के विषय में यह कहा जा सकता है कि मंत्र को साधने से पहले उसके विषय में ज्ञातव्य बातों को जान लेना आवश्यक है। विशेष रूप से उन परिस्थितियों के लिए जब हम किसी भौतिक प्रयोजन के लिए मंत्र का प्रयोग कर रहे हों। कई बार मंत्र एक ही स्थान अथवा एक ही पुस्तक में नहीं मिल पाते।

इनका संग्रह करना एक दुष्कर कर्म है। जप में एकाग्रता, श्रद्धा तथा विश्वास की आवश्यकता होती है। यह सत्य है कि मन को नियंत्रित रखना कठिन है किंतु इसके लिए प्रयास करते रहना चाहिए और अपने भीतर विराजमान आत्मा से याचना करनी चाहिए। उसकी कृपा से मन पर नियंत्रण करने में सफलता अवश्य मिलेगी। मंत्र विज्ञान को समझने के लिए समय की आवश्यकता होती है। मंत्र स्वयं में पूर्ण नहीं होता अपितु उसके साथ एक पद्धति भी है। यह पद्धति मंत्र के साथ मिलकर सफलता का निर्माण करती है। जैसे गेहूं स्वयं में रोटी नहीं है। रोटी को खाने योग्य बनाने के लिए एक पद्धति अपनानी होगी तब जाकर हमारे उपयोग के लिए रोटी बनेगी। उसी प्रकार मंत्र के साथ एक पद्धति जुड़ी रहती है तब जाकर मंत्र हमारे उपयोग की वस्तु बनता है। अतएव मंत्र की पद्धति का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके ही मंत्र का लाभ उठाया जा सकता है।

मंत्र मुक्ति का मार्ग है। मंत्रों के द्वारा न केवल मानसिक शांति मिलती है बल्कि शारीरिक रोग भी नष्ट होते हैं। मंत्र द्वारा मोक्ष के द्वार भी खुल जाते हैं। आखिर क्या है मंत्र? यह कैसे कार्य करता है? मंत्र जप को दो श्रेणी में रखा जाता है-एक, स्वकेंद्रित और दूसरा, समाज केंद्रित। मंत्र का जप करना एक भौतिक प्रक्रिया है। इसके मध्य शरीर के संवेदनशील अंगों में कंपन होता है जो एक निश्चित प्रकार की ध्वनि उत्पन्न करता है। इस स्तर पर शब्द और शक्ति-दोनों अपने समन्वित रूप में रहते हैं।

किसी कार्य के लिए अनेक मंत्रों के होने से यह लाभ है कि साधक उनमें से उसी मंत्र को चुने जो उसके लिए अनुकूल हो। अगर एक कार्य के लिए कई मंत्र हैं तो ऐसी स्थिति में अनुकूल मंत्र का चयन करना चाहिए। किसी कार्य हेतु दूसरा मंत्र न मिलने पर उसमें किसी भी तरह का परिवर्तन नहीं करना चाहिए। अगर ऐसा करना बहुत आवश्यक हो तो किसी योग्य गुरु का परामर्श लेना चाहिए।

मंत्रों का चयन और प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए। मंत्रों की अनुकूलता और प्रतिकूलता देखने के लिए कुलाकुल चक्र का ज्ञान होना परम आवश्यक है। मंत्र कोई जड़ प्रक्रिया नहीं है। मंत्र की मानसिक क्रिया में चेतन तत्व समाहित रहता है। इस चेतन के साथ ही प्रत्येक साधक का अस्तित्व प्रकट होता है। यह अस्तित्व हमारे. साथ अनेक जन्मों के इतिहास से जुड़ा हुआ है। किन्हीं अज्ञात जन्म में किए गए कर्म दोष के रूप में मध्य चेतना को ढके रहते हैं। मंत्र जप उस दोष को हटाने की प्रक्रिया है। जब तक ये दोष रहते हैं तब तक सिद्धि नहीं मिलती। जप तीन प्रकार के माने गए हैं-पहला मानसिक जप, दूसरा वाचिक जप और तीसरा कायिक जप। इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

मानसिक जाप–मानसिक जप में मंत्र का पाठ हृदय में किया जाता है। इसका प्रयोग कार्य की सिद्धि के लिए होता है।

वाचिक जप-वाचिक जप में मंत्र को सस्वर पढ़ा जाता है। इसका प्रयोग पुत्र प्राप्ति के लिए होता है।

कायिक जप-कायिक जप में बिना बोले मंत्र को पड़ा जाता है जिसमें केवल होंठ हिलते रहते हैं। इसका प्रयोग धन प्राप्ति के लिए होता है।

इन तीनों जपों में मानसिक जप सबसे उत्तम बताया गया है। मंत्र का जप उंगलियों के पोरों पर या प्राण-प्रतिष्ठित माला द्वारा करना चाहिए। माला स्फटिक, रुद्राक्ष, अकीक, प्रवाल अथवा मोती की हो सकती है।

वशीकरण करने के लिए दोपहर से पहले के काल में स्वस्तिकासन युक्त उत्तर दिशा की तरफ मुंह करके कमल मुद्रा में बैठ जाएं। फिर ब्रह्मग्रंथि लगी मूंगे की प्राण-प्रतिष्ठित माला से जप करें। मंत्र साधना पूर्ण करने के बाद जप का फल प्रभु को समर्पित कर दें। जो कुछ हम प्रभु को समर्पित करते हैं, वह हमें असीम होकर पुन: प्राप्त होता है तथा स्थिर हो जाता है। फिर उसका सदुपयोग होता है। गुरु मंत्र की महिमा अपरंपार है। गुरु द्वारा प्रदत्त मंत्र को गुरु के आदेश पर जपने से अद्‌भुत लाभ प्राप्त होता है। प्राचीन काल में गुरु अपने शिष्य के कान में मंत्र फूंकते थे। इसके पीछे तांत्रिक मंत्र शक्ति को गुप्त रखने का रहस्य है। मौन में सबसे अधिक शक्ति है। भगवान श्रीकृष्ण ने ‘ श्रीमद्‌भगवद् गीता ‘ में स्वयं को मौन अपनी महान विभूति बताया है। वास्तविक साधना वह है जिसमें किसी को पता ही न चले कि आप साधना कर रहे हैं। गुरु की आज्ञा से श्रद्धापूर्वक साधना करने पर साधक को गुरु के गुणों, शक्तियों तथा ज्ञान का लाभ प्राप्त होता है। निजी साधना के अनुसार प्रत्येक गुरु की अपनी- अपनी शक्ति एवं ज्ञान की पूंजी होती है। कोई दो गुरु समान नहीं होते तथा हमें उनकी तुलना भी कभी नहीं करनी चाहिए। गुरु माध्यम होता है-निर्गुण और निराकार परमात्मा तथा शिष्य के मध्य। गुरु पूजा का अर्थ है-गुरु के आदेशानुसार साधना करना तथा अपने जीवन में दिव्यता लाना ताकि हमारी नकारात्मक प्रवृत्तियां हमारे नियंत्रण में आ जाएं।

गुरु गुरु ही होता है। उसकी विद्वत्ता, शक्ति एवं ज्ञान को आंकना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होता। गुरु को गुरु मंत्र परंपरा से प्राप्त होता है। यह अचूक एवं अमोघ होता है। गुरु मंत्र चाहे आध्यात्मिक हो अथवा तांत्रिक-वह चमत्कारी होता है। तांत्रिक गुरु-मंत्र सोने पर सुहागे के समान कहा गया है।

No Comments

Post a Comment

Comment
Name
Email
Website