Mohini Vashikaran Mantra Specialist (Mohini Vidya in Hindi)

तत्र-मंत्र विज्ञान में मोहिनी विद्या, सम्मोहन अथवा मोहन भी एक चमत्कारी विद्या है। मोहिनी विद्या के विषय में तांत्रिकों एवं मनोचिकित्सकों द्वारा निरंतर अनुसंधान किए जा रहे हैं और यह प्रयास हो रहा है कि क्या दूसरों के मन की बातें जानी जा सकती हैं? जब से मनुष्य ज्ञान प्राप्त करने की ओर अग्रसर हुआ तब से उसके हृदय में यह भावना आ गई कि किसी व्यक्ति के बोलने से पूर्व ही उसके संबंध में जानकारी हो जाए उसे अपने अनुकूल बनाया जा सके अथवा विपरीत परिस्थितियों से बचा जा सके। लेकिन इस बारे में पर्याप्त ज्ञान न होने के कारण व्यक्ति प्रतिक्षण आतंकित रहता है। उसे आशंका रहती है कि कोई उसके साथ विश्वासघात तो नहीं कर रहा है। जीवन में उसने जो कार्य छिपाकर किए हैं, उसके विषय में कहीं दूसरों को ज्ञान तो नहीं है। इन्हीं विचारों के कारण उसमें मानसिक तनाव बना रहता है जिसका प्रभाव उसके शरीर और कार्य क्षमता पर पड़ता है। वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि विचार मन में नहीं, मस्तिष्कमें उत्पन्न होता है जिसके फलस्वरूप मस्तिष्क में एक धुंधला सा चित्र बनता है। ये चित्र विचार तरंगों के माध्यम से वातावरण में प्रवाहित होते हैं। इस तरंग रूपी विचार को दूसरा व्यक्ति ग्रहण कर सकता है, अगर उसमें यह शक्ति विद्यमान है। परंतु मस्तिष्क की इस ग्रहण शक्ति को अभ्यास द्वारा ही जाग्रत किया जा सकता है। इसके लिए सम्मोहन विशेषज्ञों द्वारा त्राटक सदृश विभिन्न प्रयोग किए गए। इसमें जिस व्यक्ति के मन की बात जाननी हो, उसे सामने बिठाया गया और उसकी आखों में झांककर विचारों को जानने का प्रयास किया गया। ऐसे में कुछ अंश तक सफलता भी मिली जिससे यह सिद्ध हो गया कि विचार तरंगों के माध्यम से प्रवाहित होते हैं और उन्हें ग्रहण किया जा सकता है। इस प्रयोग में एक कमी यह थी कि जिसके मन की बात जाननी हो, उसे अपने सामने बिठाना होता था। इसके अलावा प्रयोगकर्ता को त्राटक सिद्ध होना चाहिए ताकि उसकी मानसिक शक्ति सामने वाले व्यक्ति से प्रबल हो। भारतवर्ष में मोहिनी विद्या को एक चमत्कार के रूप में देखा जाता है।

प्राचीन ग्रंथों में इसका वर्णन कठिन सिद्धि के रूप में किया गया है। विदेशों में इस विद्या को एक गंभीर विषय मानते हुए निरंतर शोध हो रहे हैं। मस्तिष्क के भीतर ताक-झांक करने वाली नवीनतम तकनीकों के द्वारा वश में हुए व्यक्तियों पर प्रयोग किए जा रहे हैं। इससे चौंकाने वाले परिणाम सामने आए हैं।

पौराणिक ग्रंथों-‘ रामायण ‘ एवं ‘ महाभारत ‘ आदि में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं कि सामने वाले को ज्ञान हो जाता है कि उसका शत्रु उसके विषय में क्या सोच रहा है? इससे यह स्पष्ट है कि उनके पास कोई न कोई सशक्त विद्या अवश्य थी जो कालांतर में समुचित विकास के अभाव में लुप्त हो गई। ज्ञान के स्थान पर तर्क आ गया लेकिन आज भी मोहिनी विद्या के जानकार विद्वानों की कमी नहीं है। यह अलग बात है कि व्यस्तता के कारण उन्होंने स्वयं को प्रकट नहीं किया है। भगवान श्रीकृष्ण की मोहिनी विद्या से कौन परिचित नहीं है? जब वे बांसुरी बजाते थे तब दूर-दूर तक के पशु-पक्षियों तथा गोप-गोपियों-सब पर मोहिनी छा जाती थी। सभी मंत्रमुग्ध होकर उनकी तरफ खिंचे चले आते थे। मोहिनी विद्या के जानकार को सबसे पहले पूर्वाभास होता है, उसके पश्चात वह मोहिनी विद्या का प्रयोग करता है। यह पूर्वाभास स्वत: हो जाता है। मनुष्य के भीतर पूर्वाभास की एक विलक्षण शक्ति होती है। पूर्वाभास की क्षमता उन लोगों में सबसे अधिक होती है जो चिंतनशील अथवा अधिक धार्मिक होते हैं। यदि आलसी लोगों को थोड़ा- बहुत आभास हो भी जाए तो वे उसे केवल भ्रम समझकर छोड़ देते हैं और इसके परिणामों के विषय में नहीं सोचते।

अनेक बार पूर्वाभास से पहले उसके लिए भूमिका तैयार करनी प्रारंभ हो जाती है। अनायास ही आपके अवचेतन मन में किसी घटना के घटित होने की संभावना उत्पन्न होती है। आपका अवचेतन मन सभी पहलुओं पर विचार करना प्रारंभ कर देता है। यदि वह घटना आपसे संबंधित है तो आप उससे सुरक्षा के लिए तर्को का ताना-बाना बुनना शुरू कर देते हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि घटना तो घटती नहीं है लेकिन मन के धरातल पर वह पहले ही घट जाती है। यह बिलकुल आवश्यक नहीं है कि जो विचार मन में उठ रहे हों, वे सभी पूर्वाभास से जुडे हों। वस्तुत: यह आत्मा से निकलने वाली ऐसी दैवी भविष्यवाणी होती है जो घटित होकर ही रहती है। कई बार हममें से कोई कह देता है कि उसके साथ ऐसा होना ही था। कभी-कभी तो मन-मस्तिष्क पर बल दिए बिना हम कोई भविष्यवाणी अनायास ही कर देते हैं जो सत्य सिद्ध होती है।

कुछ विशेष प्रकार के मनोरोग लंबे समय तक चलते हैं। उनमें उन्माद जनित रोग प्रमुख है। सम्मोहन द्वारा मनोरोगों के लक्षणों को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है किंतु प्राकृतिक रूप से मनोरोगों में पुनरावृत्ति की दर अधिक होती है। अगर ऐसे रोगियों को पुनरावर्तन रोकथाम की चिकित्सा न दी जाए तो वे दोबारा रोग से प्रभावित हो जाते हैं।

अनेक बार आपके मन में अचानक अशांति या आशंका छा जाती है। किसी दुर्घटना का मन में खटका सा होने लगता है, किसी दूरस्थ मित्र के प्रति कुशंका होने लगती है और कुछ समय पश्चात ऐसी दुर्घटना का संदेश मिलता है जिसकी आपने कल्पना भी नहीं की थी। ये सब क्या है? यह वही तो संदेश था जो तरंगों के माध्यम से आप तक आया लेकिन आप समझ नहीं सके। इन विचार तरंगों को ग्रहण करने एवं भेजने में पूर्णता के लिए सम्मोहन साधना की आवश्यकता है और इस विचार को भुलाने के लिए मोहिनी विद्या उपयोगी है।

Mohini Shabar Mantra Siddhi in Hindi

यदि संतान कहना मानने से इंकार कर दे, भाई- भाई में मनमुटाव हो और वे एक दूसरे के खून के प्यासे हों, शत्रु शत्रुता भूलने को तैयार न हो, प्रेमिका दूसरे के बहकावे में आकर संबंध तोड़ने पर उतारू हो, कोई ब्लैकमेल करता हो अथवा मनचाहे स्थान पर विवाह करने की इच्छा हो तो मोहिनी विद्या के प्रयोग काम आते हैं। मोहिनी विद्या में एक व्यक्ति दूसरे के मन-मस्तिष्क पर कुछ इस तरह हावी हो जाता है कि उसे उस व्यक्ति की बोली के अलावा और कुछ नहीं सूझता। सारी दुनिया से उसका नाता टूट जाता है। उसे केवल वही सुनाई देता है जो वह व्यक्ति कह रहा है और उसे केवल वही दिखाई देता है जिसे वह व्यक्ति देखने को कह रहा है। भले ही वह वस्तु वहां उपस्थित हो या न हो। मोहिनी से ग्रस्त व्यक्ति की इस अवस्था को आत्मविस्मृति की दशा कहा जाता है। इस दशा में सम्मोहित व्यक्ति से कुछ भी करवाया जा सकता है-यहां तक कि आत्महत्या भी।

सम्मोहित व्यक्ति द्वारा विभिन्न संगीन अपराध कराने के तमाम सच्चे-झूठे किसे-कहानियों से साहित्य भरा पड़ा है। दूसरे के तन-मन पर नियंत्रण की यह असाधारण शक्ति सदियों से आम जनों को आकर्षित करती रही है। अब प्रश्न यह उठता है कि मोहिनी विद्या या सम्मोहन वस्तुत: है क्या? यह एक मनोवैज्ञानिक धोखा या वैज्ञानिक सच? एक ओर सम्मोहन या मोहिनी विद्या को धोखा मानने वालों की कमी नहीं है तो दूसरी ओर इसे वैज्ञानिक सच्चाई सिद्ध करने के लिए सार्थक प्रयत्न किए जा रहे हैं। सम्मोहन पर शोध करने वाले सभी लोग यह मानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को सम्मोहित अथवा मोहिनी करना संभव नहीं है। केवल कुछ लोग ही सम्मोहित किए जा सकते हैं जो अति संवेदनशील होते हैं।

तंत्र विज्ञान में वशीकरण का दूसरा रूप मोहिनी विद्या है। अंतर केवल इतना है कि वशीकरण मंत्रों, तंत्रों एवं यंत्रों द्वारा होता है जबकि सम्मोहन अभ्यास के द्वारा होता है। इंग्लैंड के लिवरपूल यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक ग्राहम वेगस्टैफ का मानना है कि मोहन या सम्मोहन कल्पनाशीलता के साथ रचा गया एक जीवंत नाटक है। इस स्थिति में पहुंचा व्यक्ति वास्तव में बड़ा सजीव अभिनय कर रहा होता है। उनके इस विचार के पीछे कुछ ठोस आधार हैं।

चेतन दशा-मन-मस्तिष्क की चेतन दशा का दूसरा नाम जाग्रतावस्था है यानी चेतन दशा वह अवस्था है जिसमें हमारा विवेक चैतन्य रहता है यानी होशो- हवास बरकरार होते हैं। इसलिए अदालती कार्यवाही या वसीयत में उल्लेख रहता है कि मैंने अपने पूर्ण होशो-हवाश में सोच-समझकर यह बयान दिया है, वसीयत की है अथवा अमुक कागज पर अपने हस्ताक्षर किए हैं। मन-मस्तिष्क उस समय किसी प्रकार के दबाव या मादक द्रव्यों के अंतर्गत नहीं था।

वस्तुत: हम चेतनावस्था में ही अपना हर कार्य करते हैं यानी हमारा हर कार्य, विवेक के अनुसार होता है। चेतनावस्था में ही हमें अपने द्वारा किए गए कार्य, क्रियाकलाप और वार्तालाप याद रहते हैं। इसी आधार पर हमारी स्मरण शक्ति का संचय होता है। चेतन दशा ही हमारे विवेक और बुद्धि का परिचय देती है।

अवचेतन दशा-मन-मस्तिष्क की दूसरी दशा का नाम अवचेतन है। वास्तव में अवचेतन दशा का अर्थ बेहोशी या अर्द्ध चेतनावस्था है। यह निद्रा, आघात अथवा पीड़ा इत्यादि से उत्पन्न होती है। अवचेतन दशा में किए गए कार्यादि हमें स्मरण नहीं रहते। मन की यह अवचेतन दशा सदैव बनी रहती है। चेतन सक्रिय रहने पर भी अवचेतन अपना करिश्मा कर जाता है। विचारों में खोए रहने या बातचीत करते समय अथवा किसी उलझन में फंसे रहने के कारण हम अपनी कोई वस्तु-चाबी, पेन, कागज, रुपये इत्यादि कहीं रख देते हैं। लेकिन बाद में यह नहीं याद रहता कि अमुक वस्तु कहां रख दी थी? फिर खोजना पड़ता है। चेतनावस्था में यह अवचेतन का ही करिश्मा है। ‘हिप्नोटिज्म’ इसी अवचेतन दशा को प्रबल करके तथा मन के चेतन भाग को दबाकर अपना करिश्मा दिखाता है। फिर मनुष्य इसके प्रभाव में प्रयोगकर्ता के प्रत्येक निर्देश का पालन करता है। ‘ मोहिनी विद्या ‘ वह क्रिया है जिसके द्वारा अवचेतन को शक्तिशाली बनाकर चेतन को सुप्त कर दिया जाता है। दूसरे शब्दों में यह ‘ मोह ‘ या आकर्षण की शक्ति है। प्रयोगकर्ता यह क्रिया अपने मन की प्रबल शक्ति के बल पर करता है। उसके शरीर की ऊर्जा तरंगें सामने वाले को प्रभावित करती हैं। इससे उसकी चेतना लुप्त हो जाती है तथा उसका अवचेतन प्रबल हो जाता है। प्रत्येक मनुष्य में ऊर्जा होती है। ऊर्जा से विद्युत बनती है। विद्युत की तरंगें अपना प्रभाव डालती हैं। जिस प्रकार रेडियो स्टेशन से तरंगें बिखरती हैं और विशेष यंत्रों के कारण रेडियो सैट उन्हें ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार मनुष्य के शरीर से भी ऊर्जा तरंगें निकलती हैं जो इच्छित वस्तु या पात्र से टकराकर उस पर अपना विशेष प्रभाव डालती हैं।

इसके अलावा मनुष्य के शरीर से एक विशिष्ट गंध निकलती है। यह भी अपना कार्य करती है। इस प्रकार मनुष्य के शरीर से निकली ऊर्जा तथा ऊर्जा से उत्पन्न विद्युत तरंगें गंध विशेष से मिश्रित होकर मनुष्य पर प्रभाव डालती हैं। यह प्रभाव कितना और कहां तक होता है, यह मन की शक्ति पर निर्भर करता है। मोहिनी या हिप्नोटिज्म के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता मन की इच्छाशक्ति अर्थात आत्मबल की होती है। यह हिप्नोटिज्म का अनिवार्य माध्यम है। अत: मोहिनी विद्या सीखने वालों के लिए सर्वप्रथम आवश्यकता यह है कि वे अपनी मनशक्ति बढ़ाए। इच्छाशक्ति, आत्मबल या संकल्प में दृढ़ता लाएं। मन की शक्ति जितनी सशक्त होगी अर्थात इच्छाशक्ति जितनी प्रबल होगी, उतना ही शीघ्र सम्मोहन हो सकेगा। इसके लिए अपने मन की अलौकिक शक्तियों को इतना प्रबल बनाना होगा कि वे पात्र या वस्तु की मनःशक्ति से अधिक शक्तिशाली हो जाएं अर्थात उस पर पूर्णत: हावी हो जाएं। जब तक इस प्रकार की विजय स्थापना नहीं होगी तब तक पात्र या इच्छित वस्तु को ‘हिप्नोटाइज्ड’ नहीं किया जा सकता। दूसरों के मन पर अपना पूरा नियंत्रण करना ‘ मोहन ‘ कहलाता है। इसका अपना एक वैज्ञानिक आधार है। अब यहां दो प्रश्न महत्वपूर्ण हैं-पहला ‘ मन ‘ क्या है और दूसरा ‘ विचार ‘ क्या है? मन मनुष्य के शरीर की नीरक्षीर क्रिया यंत्र का नाम है। जिस प्रकार हंस दूध का दूध और पानी का पानी अलग कर देता है, उसी प्रकार मन विचारों का मंथन करता है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है। इसके पश्चात वह अपना निर्णय मस्तिष्क को देता है।

Mohini Vidya Sadhana and Siddhi in Hindi

विचार मस्तिष्क में उपजी इच्छाओं और तरंगों का नाम है। विचार इंद्रियों को प्रभावित करते हैं और मन से टकराकर निर्णय ग्रहण करते हैं। तब हम उसको कार्य रूप में परिणत करते हैं। एक उदाहरण से यह बात स्पष्ट हो जाएगी। मस्तिष्क से एक इच्छा तरंग निकलती है कि राम से रुपया लेना है। यह विचार मन से टकराया। मन निर्णय देता है कि ठीक है। यह सूचना मस्तिष्क को मिलती है। तब मस्तिष्क यह काम इंद्रियों को सौंप देता है और हमारे कदम राम से मिलने चल पड़ते हैं। इस प्रकार मस्तिष्क के माध्यम से पात्र के मन, विचार और मस्तिष्क पर अधिकार करना ही ‘ मोहन ‘ है। जिस प्रकार विज्ञापन के माध्यम से निर्माता ग्राहक को ‘ मोहित ‘ करके अपनी बिक्री बढ़ा लेते हैं, उसी प्रकार आपको अपने विचारों की शक्ति से इच्छित पात्र को प्रभावित और आकर्षित करना होता है।

अस्तु अपनी विचारशक्ति और इच्छाशक्ति को बढ़ाना ‘मोहिनी विद्या’ या ‘हिप्नोटिज्म’ सीखने के लिए पहला कदम है। इसका अभ्यास इस प्रकार करें- किसी परिचित या मित्र का बार-बार नाम लें और आखें बंद करके पलकों तले उसका चित्र उतारने की कोशिश करें। यथा-वह इस प्रकार के कपड़े पहने है।

उसके बाल इस प्रकार के हैं। खे, नाक, चेहरा और मुंह इस प्रकार का है। जब आप पूरी एकाग्रता के साथ चिंतन करेंगे तो मित्र का चित्र स्वत: बन जाएगा। लेकिन प्रारंभ में होता यह है कि आपने आखें बंद कर लीं, शरीर ढीला करके लेट- बैठ गए और सोचना शुरू कर दिया परंतु कुछ ही पलों बाद आपका मन कहीं अन्यत्र भटक गया। बस इसी पर आपको नियंत्रण करना है।

इस प्रकार निरंतर अभ्यास और प्रयत्न द्वारा पलकों तले चित्र उतारें। चित्र क्या है? स्वप्न में आप अपने परिजनों-परिचितों के चेहरों और दृश्यों आदि को स्पष्ट रूप से देखते हैं। जब निद्रा में ऐसा हो सकता है तो क्या जाग्रतावस्था में आप पलकें बंद करके ऐसा नहीं कर सकते? जब आप ऐसा करने में समर्थ हो जाएंगे तो निश्चित रूप से ‘हिप्नोटाइज्ड’ करने में सफलता प्राप्त कर लेंगे।

इस प्रकार का प्रारंभिक अभ्यास आपके लिए आवश्यक है। शुरू में थोड़ी सफलता मिलेगी परंतु बार-बार कोशिश करते जाइए आप पूर्णत: सफल होंगे। इस क्रिया के अलावा आपको अपना स्वास्थ्य भी देखना होगा। खान-पान अनुकूल रखना पड़ेगा। नाना प्रकार के व्यसनों से आपको अपनी रक्षा करनी होगी। मन में सात्विक विचार रखने होंगे। स्मरण रखिए गंदी भावनाएं या विचार आपके मन की शक्ति को एकदम क्षीण कर देंगे। स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का वास होता है। आपका रूप, रंग और चेहरा आदि कैसा भी हो, सबसे पहले आप सात्विक भोजन, सुविचार एवं आकर्षक व्यवहार के द्वारा अपना व्यक्तित्व उभारें। मोहिनी विद्या में इसकी भी परमावश्यकता होती है। इसके अलावा आपके लिए तनाव हानिकारक है। चिंतित, परेशान और उलझन भरा मन कभी आपका कार्य बनने नहीं देगा। मन-मस्तिष्क साफ-सुथरा, हल्का और तनाव रहित होना आवश्यक है। अस्वस्थ दशा में कभी किसी को ‘सम्मोहित’ न करें। प्रथम तो आप कर ही नहीं पाएंगे और अगर जैसे-तैसे कर भी लिया तो अनर्थ हो सकता है। पूर्ण स्वस्थ मन और पूर्ण स्वस्थ शरीर इस जटिल कार्य के लिए अति आवश्यक है।

मोहिनी विद्या में शीघ्र पारंगत होने के लिए कुछ अन्य बातें भी अनिवार्य हैं। अधिक क्रोध करने वाला, हर कार्य में शीघ्रता करने वाला तथा फालतू बोलने वाला व्यक्ति कभी भी सम्मोहन या हिप्नोटिज्म नहीं कर सकता। इन सभी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने के बाद मन पर नियंत्रण करने का अभ्यास करें। जितना आप मन पर नियंत्रण कर लेंगे, उतना ही आपके लिए सम्मोहन करना आसान होगा। जब उपरोक्त विधि के अनुसार, आप अपनी आंखें बंद करके इच्छित व्यक्ति या वस्तु का आकार बनाने में समर्थ हो जाएंगे तो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आप प्रथम चरण सिद्ध कर चुके हैं। आप मोहिनी विद्या का सफल प्रयोग कर सकते हैं।

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