What is Tantra Mantra

तत्र-मंत्र का नाम सुनते ही साधारण व्यक्ति का ध्यान ऐसी अशुभ विद्या की ओर चला जाता है जिसके प्रयोग से किसी का भी अनिष्ट किया जा सकता है या छूमंतर करके किसी व्यक्ति अथवा वस्तु का रूप बदला जा सकता है । राजा की जान किसी तांत्रिक द्वारा तोते के शरीर में कैद करने की कहानी अति प्राचीन होने के बावजूद आज भी नई है । आखिर क्या है-तंत्र-मंत्र? यदि सरल भाषा में कहा जाए तो तंत्र का अर्थ तकनीक से है जबकि मंत्र शब्दों के समूह हैं ।

माया रूपी प्रकृति में ईश्वर की अद्‌भुत शक्तियां क्रियाशील हैं । भिन्न-भिन्न देवी-देवता उसी शक्ति के प्रतीक हैं । अगर यह कहा जाए कि एक ही मूल शक्ति भिन्न-भिन्न रूपों में क्रियाशील है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । उन विभिन्न शक्तियों से सहायता लेकर स्वयं को समृद्धशाली और सुख-संपन्न बनाने का एकमात्र माध्यम तंत्र-मंत्र ही है । ‘ चाणक्य नीति ‘ में कहा गया है कि देवता न लकड़ी की मूर्ति में निवास करते हैं और न ही पत्थर की मूर्ति में । देवता का निवास मिट्टी की मूर्ति में भी नहीं है । देवता का निवास तो भावना में है । मानो तो देव, नहीं तो पत्थर-यह उक्ति भावनात्मक ही है ।

जिस प्रकार एक अदृश्य परमाणु में अनंत शक्ति छिपी होती है, उसी प्रकार एक मंत्र में भी अपार शक्ति समाई होती है । वैज्ञानिकों की ‘ बिग बैग थ्योरी ‘ के अनुसार इस सृष्टि की रचना महाशून्य में निहित ऊर्जा में विस्फोट होने से हुई और सर्वप्रथम नाद का जन्म हुआ । इसे ही नाद ब्रह्म भी कहते हैं । मंत्र का वास्तविक अर्थ है- मन का त्राता अथवा उद्धार और कल्याण करने वाला । मंत्र हमारी चेतना को परम चेतना में लीन कर देता है । हमारी चेतना को परम चेतना तक पहुंचने के मार्ग में हमारा मस्तिष्क ही एक मुख्य बाधा है । मंत्र इस बाधा को दूर करने का एक सशक्त उपाय है । बीज मंत्रों का कोई अर्थ नहीं होता; जैसे-हीं, क्रीं, ॐ आदि । परंतु इनका विधिवत शुद्ध-स्पष्ट उच्चारण करने से सघन भाव उत्पन्न होते हैं जो साधक का ही नहीं वरन पूरे विश्व का कल्याण कर सकते हैं ।

साधना आरंभ करने के लिए दृढ़ मनोबल होना परम आवश्यक है । मनोबल की वृद्धि, गुरु का परामर्श, मार्ग निर्देश तथा अन्य समस्याओं के समाधान हेतु तंत्र शास्त्र का अवलंब अवश्य प्राप्त करें । तत्संबंधी प्रयोग अथवा साधना को भली- भांति समझकर ही प्रारंभ करना उचित होता है अन्यथा तनिक सी त्रुटि सारा श्रम व्यर्थ कर देती है । यही नहीं, कभी-कभी अपनी साधनागत भूल के कारण साधक को शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक रूप से क्षति भी उठानी पड़ती है ।

तंत्र विद्या क्या है

तांत्रिक गुरुओं ने कहा है कि ज्ञानार्जन की कोई आयु नहीं हो सकती । हमारे ऋषि-मुनि निरंतर अन्वेषण करते रहते थे । पर्वत से लेकर परमाणु तक सब कुछ उनके लिए शोधनीय था । तंत्र के विषय में उन्होंने केवल वनस्पति और धातु का ही प्रयोग नहीं किया वरन वे पशु-पक्षी और मानव तक की उपयोगिता .को परखते रहे । उनमें अटूट धैर्य और परम उत्साह होता था । वे नित्य नए अनुसंधान तथा प्रयोग करते हुए अपना संपूर्ण जीवन बिता देते थे ।

तंत्र ग्रंथों में कई स्थानों पर विभिन्न प्रकार के ऐसे प्रयोग प्राप्त होते हैं जो किसी न’ किसी पशु-पक्षी अथवा स्त्री-पुरुष से संबंध रखते हैं । आशय यह है कि जितनी प्रभावात्मकता वनस्पतियों में होती है, उससे कहीं अधिक पशु-पक्षियों के शरीर में पाई जाती है । निम्न वर्ग के साधक जिन्हें मांसादि से घृणा नहीं है, ऐसे प्रयोगों में विशेष रुचि रखते हैं । कदाचित यही सोचकर पशु-पक्षी आदि के तांत्रिक प्रयोग आविष्कृत हुए थे । यह भी हो सकता है कि ऐसे आविष्कारों का जनक कोई वाममार्गी साधक रहा हो । साधनों की भिन्नता होने पर भी साध्य की एकरूपता दृष्टिगोचर होती है । स्वास्थ्य-लाभ, कलह-शांति, विवाद-विजय, अर्थ-प्राप्ति, वशीकरण, आकर्षण, सम्मोहन, विद्वेषण एवं स्तंभन आदि सामान्य जन के उद्देश्य होते हैं । इनकी पूर्ति के लिए वह अनेक प्रकार के माध्यम अपनाता है । सात्विक या तामसिक साधना, भौतिक प्रयास, शक्ति प्रयोग और छल आदि उपायों से वह अभी तक सफलता प्राप्ति का प्रयास करता चला आ रहा है ।

तंत्र साहित्य में प्राणी तंत्र का विवेचन मिलता है । भले ही आज के युग में यह सब अविश्वसनीय लगे तथा अनैतिक भी हो परंतु परखने वालों ने इन्हें उपयोगी लिखा और अधिकांश ने इसकी प्रामाणिकता को स्वीकार किया । अब यह कहने की आवश्यकता नहीं कि तंत्र बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय है । यह अलग बात है कि कुछ पाखंडी तांत्रिकों ने इसे स्वयं के हित साधन की विद्या बना ली है । ‘तैत्तिरीयोपनिषद्’ की यह कथा बहुत सार्थक है- भूगु ने अपने पिता वरुण से कहा कि पिताश्री! मैं ब्रह्म ज्ञान पाना चाहता हूं । पिता ने तप करने की आज्ञा दी । कठिन तपस्या से पुत्र ने ज्ञान प्राप्त किया कि अन्न ही ब्रह्म है । पिता ने फिर तप करने को कहा । पुत्र ने पुन: तप करके पता लगाया कि श्वास ही ब्रह्म है । पिता ने पुन: लौटा दिया । पुत्र ने फिर तप किया और बताया कि ब्रह्म हृदय है । पिता ने कहा कि तुम्हारी साधना अभी और समय मांगती है । पुत्र ने तप करके ज्ञान प्राप्त किया कि विज्ञान ही ब्रह्म है । पिता ने कहा कि तुम्हारी साधना धीरे- धीरे पूर्णता की ओर बढ़ रही है । थोड़ा तप और करो । पुत्र ने साधना की गहनतम भूमिकाओं को पार करके उत्तर दिया कि दिव्य आनंद ही ब्रह्म है । सिद्धि प्राप्ति का आधार है-प्रेम और सतत साधना । यही ब्रह्म है, यही आनंद है ।

मान-सम्मान की इच्छा, अहंकार की उत्पत्ति तथा धन, पद, काम, लोभ एवं शक्ति की कामना अच्छे- अच्छे साधकों को पथभ्रष्ट कर देती है । तंत्र मार्ग में तांत्रिक की ख्याति, साधना में सफलता और दमकता शरीर यह सब एक स्त्री के सहयोग से प्राप्त होता है । अब वह स्त्री उसकी पत्नी, प्रेयसी, बहन या भैरवी कोई भी हो सकती है । तांत्रिक का विनाश, साधना में असफलता और तेजहीन शरीर- यह सब भी एक स्त्री के कारण ही होता है ।
साधक का उद्देश्य काम (सेक्स) कभी नहीं हो सकता । जिन्होंने काम को मंजिल माना, वे डूब गए । उनका नाम लेने वाला तक नहीं रहा । यह ध्रुव सत्य है । श्री रामकृष्ण परमहंस ने अहंकार को समाप्त करने के लिए डोम के घर जाकर अपने लंबे केशों से उसके शौचालय को साफ किया था । योगेश्वर श्रीकृष्ण सबके पूज्य थे किंतु उन्होंने पांडवों का दूत बनना स्वीकार किया तथा अर्जुन के रथ का सारथी बनने जैसा छोटा कार्य स्वयं चुना । यही नहीं, जब विजयोपरांत पांडवों ने राजसूय यज्ञ किया तो श्रीकृष्ण ने स्वेच्छा से भोजनोपरांत अतिथियों की जूठी पत्तलें उठाने का दायित्व ग्रहण किया । ऐसा उदाहरण भला और कहां मिलेगा?

संत दादू सड़क के किनारे झाड़ियां साफ कर रहे थे तभी दंभी कोतवाल ने उनसे पूछा कि संत दादू की कुटिया कहां है? कोतवाल के सम्मुख उन्होंने मौन रहना उचित समझा । इस पर कोतवाल ने उन्हें पीट-पीटकर लहूलुहान कर डाला परंतु दादू ने नहीं बताया कि वे ही संत दादू हैं । वे कोतवाल का दंभ समाप्त करना चाहते थे । अत: दादू पिटते रहे और मौन रहे । जब कोतवाल को अपनी भूल का पता चला तो बहुत पछताया । उसका सारा घमंड बर्फ की तरह पिघलकर बह गया । सच्चा तांत्रिक वह है जो सम्मान नहीं चाहता । जो अपनी शक्ति-विद्या का प्रदर्शन करता है तथा गुरु-मित्र से दगा करता है, उसके लिए तो सजा पहले से ही निश्चित है-वह अंधा बने या कोढी । शक्ति मंत्र-तंत्र साधनाओं द्वारा प्राप्त होती है । शक्ति साधना के अभाव में हम दीन-हीन, याचक एवं विकलांग बने रहते हैं ।

तंत्र मंत्र की विद्या

अगर आप तंत्र साधना से लाभ उठाना चाहते हैं तो पांच बातें सदैव ध्यान में रखें । यदि अपना चित्त शांत न हो तो साधना न करें । धन प्राप्ति के लिए या प्रश्नकर्ता को प्रसन्न करने के लिए अपनी सिद्धि या शक्ति का उपयोग न करें । किसी भी मोह के वश में फंसकर तांत्रिक प्रयोग न करें । नैतिक आचरण करें । सरल व्यवहार और सारासार का विचार करके उपाय बताएं । साधना का समय, स्थान और सामग्री एक रखें । ये साधना में सफलता प्राप्ति के प्रमुख सूत्र हैं । साधना लंबी यात्रा है । बहुत डुबकियां लगानी होंगी तंत्र के सागर में । तांत्रिकों का वचन है कि हजारों मील की यात्रा एक-एक कदम चलकर पूरी हो जाती है । दो कदम तो कोई भी एक साथ नहीं चल सकता । सभी को एक कदम ही एक बार में चलना पड़ता है ।

तंत्र ज्ञान की संपदा सभी को नहीं दी जा सकती । हीरे उन्हीं को दिए जा सकते हैं जो पारखी हों । क्योंकि जो नहीं जानते, उनके लिए तो हीरा पत्थर है और उसे खोने में अधिक देर नहीं लगेगी । तंत्र ज्ञान की संपदा अदृश्य है, उसके पारखी खोजना बहुत कठिन है । जो उसे लेने को तैयार न हो, उन्हें देने से कोई लाभ नहीं है । जिनके हृदय के द्वार बिलकुल खुले हों, केवल वे ही तंत्र की संपदा संभाल पाएंगे । तंत्र-मंत्र साधना सुगम है लेकिन इसके लिए सरलता चाहिए । सरलता का अर्थ है-विपरीत दिशाओं में यात्रा मत करो, तुम सरल हो जाओगे । यदि तुम विपरीत दिशाओं में चलोगे तो जटिल हो जाओगे ।

एक आदमी बैलगाड़ी में दोनों तरफ बैल जोतकर दोनों तरफ हांक रहा है अत: बैलगाड़ी कहीं नहीं जा सकती । वह क्रोध में चीख-चिल्ला रहा है । कह रहा है-कोई मार्ग बताओ । उससे कहो कि एक दिशा के बैल खोल दो । दोनों बैलों को एक ही दिशा में जोत दो तभी बैलगाड़ी चलेगी । लेकिन खेद की बात यह है कि दोनों दिशाओं में उसके लक्ष्य हैं । एक तरफ घर है और दूसरी तरफ कार्यालय है । इस तरफ चिंता है और उस तरफ शांति है । इस तरफ धन है और उस तरफ साधना है । वह दोनों चाहता है । वह कहता है- आप ऐसा आशीर्वाद दें कि यह बैलगाड़ी दोनों तरफ चले और मंजिल पर पहुंच जाए ।

तंत्र मंत्र यंत्र वशीकरण

तंत्र विज्ञान एक शक्ति है । यह निर्माण भी कर सकती है और विनाश भी । सृजन भी कर सकती है और विसर्जन भी । अब यह साधक पर निर्भर है कि वह शक्ति का उपयोग किस प्रकार करता है?’ शक्ति ‘ शब्द की व्याख्या ‘ देवीभागवत ‘ में इस प्रकार की गई है-‘ श ‘ शब्द ऐश्वर्य वाचक है औरु ‘ क्ति ‘ शब्द पराक्रम के अर्थ में है । अतएव ऐश्वर्य और पराक्रम प्रदान करने वाली ‘ शक्ति ‘ कहलाती है । व्यवहार में ‘ शक्ति ‘ का अर्थ है- सामर्थ्य, बल और पराक्रम । शक्ति का अर्थ उपाधि भी है । इस ईश-शक्ति को ‘ श्रीमद्‌भगवद् गीता ‘ में माया-योग और प्रकृति आदि नाम दिए गए हैं ।

तांत्रिक शक्ति का पुजारी होता है । आज का मानव धन में शक्ति समझता है । साधना-उपासना को वह समय व्यतीत करने का साधन मानता है । तंत्र विज्ञान का आविष्कार बहुत पुराना है और उसका संबंध ईश्वर भीरू मानसिकता से है । साथ ही, आज समाज में व्यास भ्रष्टाचार और उससे उत्पन्न समस्त मानसिक विकृतियों (लोभ, तनाव या समृद्धि के लिए छोटा मार्ग) की खोज से भी है । लोग विश्राम पाने और आध्यात्मिक क्षणों को जीने का भ्रम पाले रहते हैं ।

तंत्र पर अनेक भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों ने अन्य दृष्टि से विचार किया है तथा उसके आध्यात्मिक पक्ष के साथ-साथ उसकी सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को भी रेखांकित करने का प्रयत्न किया है । आचार्य पतंजलि ने कहा है- “सुखी के प्रति मित्रता, दुखी के प्रति करुणा, पुण्यात्मा के प्रति हर्ष और पापी के प्रति उपेक्षा की भावना करने से चित्त प्रसन्न एवं निर्मल होता है ।”

आदिम समाज में कृषि के साथ तंत्र की एक शाखा जादू-टोना भी अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ था । मध्य प्रांत के नाम से पहचाने जाने वाले पुराने ‘ मध्य प्रांत और बरार ‘ में कुरमी लोग सावन मास के मध्य में ‘ हरेली ‘ त्योहार का आयोजन करते हैं । इस दिन पशुओं को पके चावल खिलाए जाते हैं । हल को स्नान कराकर उसे सूरज के सामने रखकर उस पर घी-मक्खन आदि चढ़ाया जाता है । उत्तर प्रदेश में भी वर्षा में देवी की पूजा होती है । यहां तक कि प्राचीन वैदिक समाज में भी कृषि के लिए जादू-टोने को महत्वपूर्ण माना जाता है । जादू-टोने की आधारशिला अज्ञान है लेकिन उसका मनोवैज्ञानिक महत्व भी है । जादू का आधार यह है कि हम एक मायाजाल की सृष्टि करके यथार्थ पर नियंत्रण पा सकते हैं । यद्यपि यह भी एक भ्रम है तथापि इस भ्रम को पालने पर उपयोगी प्रभाव पड़ता था । वे कल्पना में किसी इच्छा को पूरी करने के पश्चात वास्तव में इच्छापूर्ति के लिए परिश्रम के साथ जुट जाते हैं । महात्मा बुद्ध जादू-टोना, चमत्कारिक शक्ति या तांत्रिक शक्ति से दूर रहने के लिए कहा करते थे किंतु अर्हत् साधक अलौकिक शक्ति संपन्न होते थे । इस तथ्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता । अर्हत् जिस अलौकिक शक्ति को प्राप्त करते थे, उसे सिद्धि अथवा पाली में बुद्धि कहा जाता है । बुद्ध के अनुसार ये चमत्कारिक शक्तियां अवनति के पथ पर ले जाती हैं । अत: वे अपने शिष्यों को इन शक्तियों के प्रयोग से अलग रहने के लिए कहा करते थे ।

महात्मा बुद्ध अलौकिक शक्तियों के विषय में असत्य प्रचार को बड़ा दोष मानते थे । इसके दंड स्वरूप उन्हें समाज से निष्कासित कर दिया जाता था । एक साधक जो अपने चमत्कार का प्रदर्शन आर्थिक लाभ के लिए करता है, वह उस स्त्री के समान है जो अपनी देह का प्रदर्शन धन के लिए करती है । किंतु समय– समय पर महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों को चमत्कारिक शक्ति दिखाने की अनुमति भी दी । उन्होंने स्वयं भी इस शक्ति का प्रयोग किया है । केवल चमत्कार ही नहीं बल्कि पाली त्रिपिटक में भी तंत्र-मंत्र की चर्चा है । इस तरह बौद्ध धर्म में प्रारंभ से ही तंत्र-मंत्र का व्यापक उल्लेख मिलता है ।

साधना में सफलता पाने के लिए कर्म करना भी अनिवार्य है । कर्म ही व्यक्ति को पुण्य या पाप देते हैं । पुण्य स्वर्ग से बांधता है और भोगों से भटकाता है जबकि पाप नरक से बांधता है तथा नीच योनियों एवं दुखों में भटकाता है । कर्म किए बिना हम नहीं रह सकते । सभी लोग कर्म छोड्‌कर आलसी होकर बैठे रहें फिर भी कुछ न कुछ कर्म तन-मन से अवश्य होंगे । कर्म से पलायन करने पर कर्म का त्याग नहीं होता और कर्म करते रहने से भी कर्म का त्याग नहीं होता । इसलिए कर्म में रत रहने पर ही साधक को साधना में सफलता मिलती है ।

इसके अलावा मनुष्य को अपनी साधना का आदर करना चाहिए । उसे साधना का गला घोंटकर लौकिक प्रगति नहीं करनी चाहिए । यदि लौकिक प्रगति हो और आध्यात्मिक प्रगति छूटती हो तो अपना अहित होता है । लौकिक प्रगति का अर्थ हैं-दूर-दूर तक नाम-यश लेकिन भीतर देखो तो चिंता, भय, शोक और छल-कपट । लौकिक लाभ दिखता तो बहुत है परंतु होता है बारूद से भरे अनार जैसा । आध्यात्मिक लाभ दिखाई नहीं देता परंतु होता है सच्चे अनार जैसा जो प्यास मिटाता है, मिठास देता है, हृदय में शांति रखता है और कभी साथ नहीं छोड़ता । निर्मल मन शक्ति का केन्द्र है । उसका समूचे शरीर पर अधिकार है । यदि मन में दुख-चिंताएं जमी रहेंगी तो वे निश्चय ही स्वास्थ्य को नष्ट कर देंगी । इसलिए कैसी भी परिस्थिति आए तंत्र का सहारा लीजिए ।

भौतिकतावादी लोग शरीर और आत्मा को एक समझकर सुंदर बनने में जुटे रहते हैं । अविनाशी आत्मा ही वह शाश्वत ऊर्जा है जो समस्त शरीर को संचालित किए रहती है । गुण तथा कलाओं के अनुसार आत्मा को शरीर इसलिए प्राप्त होता है ताकि वह सुकर्म कर सके । साधना ही आत्मा का भोजन है । साधना में मग्न रहने से आत्मा को भी शक्तियों की खुराक मिलती है । आत्मा शरीर से भिन्न एक अभौतिक सत्ता है । लोग साधना के सत्य रूप को पहचानते ही नहीं हैं । सारा विश्व दिग्भ्रमित होकर सही प्रकार से साधना-उपासना नहीं कर पा रहा है ।

तांत्रिक विद्या मंत्र (तांत्रिक वशीकरण मंत्र)

तांत्रिक गुरुओं की उद्‌घोषणा के अनुसार साधना और मोह का मेल नहीं है । जहां साधना-उपासना है, वहां मोह नहीं होता और जहां मोह की छाया होती है, वहां साधना फलित नहीं होती । जिस प्रकार अंधियारा एवं उजियारा एक साथ नहीं रह सकते, उसी प्रकार साधना और संसार भी एक साथ नहीं रह सकते । मोह त्यागने का अर्थ परिवार या समाज को त्यागना नहीं है । इस बात का आशय यह है कि संसार में रही परंतु संसार को अपने भीतर न आने दो ।

साधना में सफलता हेतु साधक में ऐसी चेतना जाग्रत होनी चाहिए ताकि उसमें बुरे विचार न आएं । इस प्रकार साधना की पहली सफलता हैं-बुरे विचारों पर अंकुश लग जाना । जितने बुरे विचार हैं, उनके निकलने का दरवाजा बंद हो जाए । साथ ही साथ इस बात के प्रति जागरूक होना चाहिए कि हमें चित्त की निर्मलता प्राप्त करना है । निर्मल चित्त में अशुभ विचार प्रमुदित नहीं होते ।

इसके अलावा चित्त में अनावश्यक विचार भी न आएं और शुद्ध विचार का विकास करके हम साधना को आगे बढ़ाए । अगर साधना अथवा ध्यान करने वाला व्यक्ति चिंतनशील न रहे तो कोई साधक के पास नहीं फटकेगा । हमें साधनाहीन नहीं होना है, विचार से खाली भी नहीं होना है अपितु अनावश्यक विचार से मुक्त होना है । दिन भर जो व्यर्थ के विचार आते रहते हैं, उनको रोकना है । वही विचार आएं जो आवश्यक हैं और हमारी साधना में सहयोगी बन सकें । अनावश्यक विचार मानसिक तनाव उत्पन्न करते हैं । अनेक लोगों के सो जाने पर भी उनके मस्तिष्क में विचारों का प्रवाह चलता रहता है । जब विचार चलेगा तो नींद नहीं आएगी । तंत्र साधना का उद्देश्य विचार के विकास को रोकना नहीं बल्कि विचार का विकास करना है । यदि अनावश्यक विचार आएंगे तो विचार की शक्ति निर्बल पड़ जाएगी । सोचने और साधना करने की क्षमता कम हो जाएगी । अगर हम आवश्यक विचार करेंगे तो हमारी यह क्षमता अधिक बढ़ जाएगी ।

एक अन्य आवश्यक बात यह है कि जीवन में सिद्धि पाने के लिए साधना करनी चाहिए क्योंकि बिना उद्देश्य के साधना संभव नहीं है । उद्देश्य प्राप्ति के लिए भी कुछ बाधाओं की चट्टाने हैं । उन चट्टानों को सामने से हटाए बिना सिद्धि संभव नहीं है । काम, क्रोध, मद तथा मोह–चार चट्टाने हैं जो सिद्धि प्राप्ति के लिए बाधक हैं । इन चट्टानों को तोड़ना होगा अन्यथा मन भटकता ही रहेगा । आपके जीवन में कुछ करने का उद्देश्य होना चाहिए । उद्देश्य न होने पर जीवन उस गाड़ी की तरह है जो निरंतर चलती तो रहती है किंतु उसका अपना कोई लक्ष्य नहीं रहता । जिसने भी अपने जीवन में सफलता प्राप्त की है, अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सहारा लिया है-वह है साधना और एकाग्रता । सफलता का मूलमंत्र ही साधना है ।

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